चंद्र दोष/ पुर्णिमा व्रत/ चंद्रमा के उपाय

कुछ दर्शकों ने आज पूर्णिमा व्रत के बारे में पूछा। यह पोस्ट उन सभी दर्शकों को समर्पित है जो चन्द्र दोष से प्रभावित हैं या वे पूर्णिमा व्रत करना चाहते हैं। पूर्णिमा व्रत चन्द्र दोष में सबसे अधिक लाभदायक है। इससे पहले हमें उन परिस्थितियों के बारे में पता होना चाहिए जो हमारी कुंडली में चंद्रमा दोष पैदा करती हैं।
जब चंद्रमा के साथ राहू की युक्ति हो रही हो तो ऐसी अवस्था को चंद्र दोष माना जाता है। इसी अवस्था को चंद्र ग्रहण भी कहा जाता है। माना जाता है कि इस अवस्था में चंद्रमा पीड़ित हो जाता है और चंद्रमा चूंकि मन का कारक है इसलिये मन में भी विकार पैदा होने लगते हैं। इसके अलावा भी कुछ और अवस्थाएं हैं जिनमें चंद्र दोष होता है। जब चंद्रमा पर राहू की दृष्टि पड़ रही हो तो यह भी चंद्र दोष कहलाता है या फिर चंद्रमा केतु के साथ युक्ति में हो तो उसे भी चंद्र दोष माना जाता है। चंद्रमा यदि नीच राशि का हो या फिर नीच ग्रह, अशुभ ग्रह या फिर पाप ग्रहों के साथ हो तो भी चंद्र दोष लगता है। जब राहू और केतु के बीच में चंद्रमा हो तो इसे भी चंद्र दोष कहते हैं। चंद्रमा पर किसी भी क्रूर ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो तो उससे भी चंद्र दोष होता है। जब सूर्य और चंद्रमा एक साथ हों यानि अमावस्या को भी चंद्र दोष कहा जाता है। इसके अलावा चंद्रमा से द्वितीय और द्वादश स्थान पर सूर्य, राहू और केतु के अलावा कोई भी ग्रह न हो तो यह भी चंद्रमा को पीड़ित करता है। इसके अलावा चंद्रमा के साथ शनि की युक्ति, चंद्रमा के साथ मंगल की युक्ति या कुंडलि में चंद्रमा के साथ तृतियेष/ षष्टेश/ अष्टमेश/ द्वादेश हो तो भी चंद्र दोष माना जाता है। अगर किसी व्यक्ति का जन्म कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या के बीच या फिर कहे तो शुक्ल पक्ष के तृतीया तक भी हुआ हो तो ऐसि स्थिति में चंद्र दोष हो सकता है ।
चंद्र दोष से जाने अंजाने में हर कोई किसी न किसी रुप में पीड़ित हो ही जाता है, और पीड़ित होने के बाद से ही जातक के जीवन में उथल-पुथल मचने लगती है, लगातार हो रही हानियों से तनावग्रस्त हो जाता है यहां तक पारिवारिक जीवन भी असंतोष से भरने लगता है। कई बार तो जीवन साथी के साथ मतभेद इतने बढ़ जाते हैं कि अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है। इसलिये चंद्र दोष से बचाव के उपाय जरुर करने चाहिये।

चंद्र दोष/ पुर्णिमा व्रत/ चंद्रमा के उपाय


चंद्र दोष से बचाव के लिये पीड़ित को चंद्रमा के अधिदेवता भगवान शिवशंकर की पूजा करनी चाहिये साथ ही शिव कवच का पाठ भी चंद्र दोष को कम करने में सहायक होता है। इनके अलावा चंद्रमा का प्रत्याधिदेवता जल को माना गया है और जल तत्व के स्वामी भगवान श्री गणेश हैं इसलिये गणेशोपासना से भी चंद्र दोष दूर होता है, विशेषकर तब जब चंद्रमां के साथ केतु युक्ति कर रहा हो। चंद्र दोष के दुसप्रभाव से बचने के लिये पूर्णिमा का व्रत बहुत लाभप्रद रह्ता है ।
पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा अपने पूरे आकार में होता है। पूर्णिमा के दिन पूजा-पाठ करना और दान देना बेहद शुभ माना जाता है। बैशाख, कार्तिक और माघ की पूर्णिमा को तीर्थ स्नान और दान पुण्य दोनों के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। इस दिन पितरों का तर्पण करना भी शुभ माना जाता है। सुबह उठ के विधि से इष्ट देव का पूजन करना चाहिए। व्रत के दिन जितना हो सके कम बोले तथा शांत रहे, किसी वाद- विवाद में न रहें । लेकिन चंद्रमा की पूजा शाम को चंद्रोदय के बाद ही कि जानी चहिये । इस व्रत में दिन में कोई भी अन्न न लें तथा चंद्रोदय से ठीक पहले अवश्य नहाना चाहिए। नहाने के पानी में थोरा गंगा जल मिल लें, हो सके तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें। नहा के स्वच्छ यथा संभव सफेद वस्त्र धारण कर, चंद्रोदय के बाद शिव पार्वती की पूजा करनी चाहिये । पूजन सामग्री तथा कथा के लिये आप पूर्णिमा व्रत की किताब खरीद लें । पूजनोपरांत एक छोटे से स्टील या चांदी के लोटे में कच्चा दूध लें और चंद्रमा को देखते हुए इस प्रकार अर्घ दे की दूध तुलसी जी के गमले में गिरे, पैर पर इसके छीटे ना परें ।
पूर्णिमा व्रत और श्री सत्यनारायण पूजा जो कि पूर्ण चन्द्रमा के दिन होते है, पूर्णिमा तिथि के एक दिन पहले भी हो सकते हैं। चतुर्दशी का पूर्णिमा व्रत तभी होता है जब पूर्णिमा की शुरुआत मध्याह्न काल के दौरान होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर चतुर्दशी मध्याह्न से आगे रहती है तो यह पूर्णिमा तीथि को प्रदूषित करती है और इस चतुर्दशी के दिन पूर्णिमा का व्रत नहीं करना चाहिए, भले ही पूर्णिमा शाम के समय हो। इस नियम पर कोई दो राय नहीं है । दक्षिण भारत में पूर्णिमा के दिन को पौर्णमी या पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है और इस दिन उपवास को पौर्णमी व्रतम के नाम से जाना जाता है। पूर्णिमा व्रतम सूर्योदय से लेकर चंद्रमा के दर्शन तक मनाया जाता है। पोरनामी उपवास के दिन दो स्थानों के लिए समान नहीं हो सकते हैं। इसलिए किसी को पूरामणि व्रतम तिथियों को नोट करने से पहले स्थान निर्धारित करना चाहिए।

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